वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया - 27

Discussion in 'Hindi Sex Stories - हिंदी सेक्स कहानियाँ' started by SexStories, Jan 30, 2018.

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    समझो गी चंदा. वो हमेशा यही समझती रहे गी के मैंने उसके साथ धोका क्या है. दुनिया बहुत छोटी है चंदा अगर किसी दिन वो मेरे सामने आ गयी तो मैं उसे से नज़रैयण मिलने के क़ाबिल भी नहीं हूँ गा. मैं उसकी जिंदगी खराब नहीं करना चाहता मैं उससे सिर्फ़ सुकछ बताना चाहता हूँ के उसे रात क्या हुआ था"

    "क्या होगा बताने से? क्या वो अपने पति को चोद कर तेरे पास आ जाएगी?"

    "नहीं और ना ही मैं ऐसा चाहता हूँ. चंदा मेरी जिंदगी मैं आने वाली वो पहली लड़की थी, मुझे तो खुद भी पता नहीं था के मुझे उसे से कब मोहब्बत हो गयी. मैंने बहुत कोशिश की मैं अपनी जिंदगी मैं गुम हो जायों, ना याद कारों उससे, मगर मुझे सकूँ नहीं मिलता. मैं उससे बस एक बार सब कुछ बताना चाहता हूँ. मैं तुम से वादा करता हूँ उसे के बाद मैं कभी उससे तंग नहीं कारों गा ना उससे कोई फोन कारों गा. बस एक बार उससे कहो के मुझसे बात कर ले"

    "ठीक है, अब की बार मेरी जब मीना से बात होगी तो मैं उसे से कहों गी वो तुझ से एक बार बात कर ले. मगर अपने वादे को याद रखना, उसके बाद कभी उससे तंग नहीं करो गे. बहुत मुश्किल से उसकी जिंदगी मैं थोड़ा सकूँ आया है, मैं नहीं चाहती के वो खराब हो"

    "मैं वादा करता हूँ, बस तुम एक बार मेरी बात करा दो उसे से"

    ******************************

    "तुम सेल फोन क्यों नहीं खरीद लेती हो? अजीब जिद है के नहीं लेना". वीरेंदर उससे अपनी पेकिंग करते हुए देख रहा था

    "जब मुझे जरूरत नहीं तो क्या कारों गी ले कर? मैंने कहाँ जाना होता है? ज्यादा से ज्यादा शॉपिंग करने जाती हूँ तब भी यादव होता है मेरे साथ, घर पे फोन है तो सही आप से बात करनी हो तो वहीं से हो जाती है". मीना ने मुस्कुराते हुए हर दफा वाला जवाब दया

    "फिर भी यार, कभी भी जरूरत पड़ सकता है"

    "जब जरूरत पड़े गी तो ले लूँ गी. आप मुझे ये बताईं के और कपड़े रखने हैं आप के या नहीं?"

    "नहीं, कोन सा महीनों के लिए जा रहा हूँ. एक हफ्ता है और वो भी पता नहीं कैसे गुज़ारों गा मैं तुम्हारे बेघार"

    "पता है मुझे, वहाँ जा के गोरी गोरी लड़कियाँ देख के आप को याद भी नहीं आए गी मेरी". मीना की बात पे वीरेंदर हँसे बेघार नहीं रही सका

    "जान-ए-वीरेंदर मैं तो एक पल के लिए भी आप की याद की कैद से आज़ाद नहीं होता किसी और को डैखहने का ख्याल कैसे आए गा?". वीरेंदर उसके पास आ के बैठ गया

    "हाँ ये पता नहीं के तुम मुझे याद करो गी या नहीं". वीरेंदर ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा

    "मीना कभी कभी मैं समझ नहीं पाता, कभी मुझे लगता है तुम मुझसे मोहब्बत करने लगी हो मगर कभी लगता है के ये सिर्फ़ मेरा वहाँ है"

    "क्यों लगता है आप को ऐसा?". मीना ने उसके सवाल का जवाब डायने की बजाए उल्टा सवाल कर दया

    "पता नहीं, पहले मैं तुम्हारे लिए अपनी मोहब्बत को समझ नहीं पाता था. अब मैं तुम्हाइन और तुम्हारी मोहब्बत को समझने की कोशिश करता रहता हूँ"

    "जरूरी तो नहीं के मोहब्बत को इजहार की जरूरत हो". मीना ने उसकी बात का कोई सीधा जवाब ना दया

    "शायद कभी कभी जरूरत पड़ जाती है"

    "अच्छा फिलहाल मोहब्बत के टॉपिक को चोद डैन, आप लेट हो रहे हैं, ये डिस्कशन हम आप की वापसी पे भी कर सकते हैं. आप तैयार हो जैन मैं खाना लगवती हूँ"

    वो उसके हाथ से अपना हाथ चुदाया कर कमरे से बाहर चली गयी. वीरेंदर अपनी जगा बैठा रही गया, हर बार यही होता था वो उसे से मोहब्बत का सवाल करता था तो वो बात को इधर उधर कर जाती थी या फिर उससे अचानक कोई काम याद आ जाता था. उससे समझ नहीं आ रही थी के वो ऐसा क्यों कर रही है आख़िर, अगर वो उसके साथ खुश नहीं थी तो खुश रहने की बहुत अच्छी ऐक्टिंग कर रही थी. लेकिन खुश रहने के लिए सिर्फ़ मोहब्बत ही तो जरूरी नहीं. उसे रात के बाद वीरेंदर ने दोबारा कभी मीना को ये एहसास नहीं होने दया के वो उसे पे भरोसा नहीं करता, कुछ वक्त जरूर लगा था मगर अब उससे लगता था जैसे मीना को उसे पे भरोसा होने लगा है मगर शायद मोहब्बत अब भी नहीं. या तो वो अपनी पहली मोहब्बत को नहीं भूली थी या फिर अभी तक मीना को उसे पर इतना भरोसा नहीं हुआ था के वो उसे से मोहब्बत का इजहार करती. जो भी था मगर अब उसका दिल चाहता था के वो मीना के मौह से मोहब्बत भरे वो अल्फ़ाज़ सुनाने जिस से उसके दिल को सकूँ आए. पता नहीं उससे और कितना इंतिज़ार करना था, वाक़ई मोहब्बत उसे जैसे इंसान के बॅस की बात नहीं थी, वो जो लोगों को कीड़े मकोडे के सिवा कुछ नहीं समझता था एक लड़की के आगे किस कदर मजबूर हो गया था

    ******************************

    "आज 9 दिन हो गये हैं और मुझे कह कर गये थे के एक हफ्ते मैं वापस आ जायों गा". मीना अपने बेड पे बैठी वीरेंदर के बारे मैं ही सोचे जा रही थी

    गुजरे 1 साल मैं बहुत कुछ बदल गया था और वो उसे से पूछता था के वो मोहब्बत का इजहार क्यों नहीं करती. उससे तो खुद भी समझ नहीं आई थी के कब उससे वीरेंदर से मोहब्बत हो गयी, कब वो उसे के लिए इतना जरूरी हो गया के अब जब वो दूर जाता था तो उससे वक्त काटना मुश्किल हो जाता था. कमरे मैं वो नहीं होता था मगर उससे लगता था जैसे वो उसके आस पास चल फिर रहा हो, उसे से बात कर रहा हो. उसे की खुशबू कमरे मैं हर जगा उसके होने का एहसास दिलाती थी

    सब कुछ बहुत आसान नहीं था, बहुत वक्त लगा था उससे वीरेंदर को समझने मैं. उसे के हर जज़्बे मैं एक शिद्दत थी जिससे मीना को अक्सर डर लगता था, गुस्सा, नफरत, मोहब्बत, हर जज़्बे का एहसास और इजहार वो ऐसी शिद्दत से करता था के कभी कभी मीना को डर लगने लगता था. शुरू शुरू मैं उससे वीरेंदर की आदत होती गयी, उस..

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